29 अगस्त, 2016

मेरे हिस्से की धूप




कोशिश की थी कभी कभी
पर मैं एहसासों की समीक्षा नहीं कर पाई 
शब्दों की गंगा जब जब मेरे आगे आई 
मैं एक बूंद में समाहित हो गई। 
शहर अलग 
किनारे अलग 
तो मैंने नाम से दोस्ती की 
जिस जिस की कलम से गंगा अवतरित हुई 
मैं समाधिस्थ हो गई !
आज आलोड़ित गंगा 
"मेरे हिस्से की धूप" बन 
सरस दरबारी के नाम से 
मेरे आगे बह रही है 
और कह रही है -

"यह हथेलियाँ  ... सच्ची हमदर्द होती हैं 
बिना कहे हर बात जान लेती हैं "

सरस दरबारी की कलम से निकली गंगा से अवतरित ये एहसास बहुत कुछ कहेंगे आपसे  ... 

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15 अगस्त, 2016

तपस्या






कलयुग में सबने सीख दी - "सीता बनो"
यह सुनकर 
स्त्री या तो मूक चित्र हो गई 
या फिर विरोध किया 
"क्यूँ बनूँ सीता ?
राम होकर पुरुष दिखाये !"
.... 
एक उथलपुथल ही रहा यह सुनने में 
!!!
आज इस सीख का गूढ़ रहस्य समझ आया 
... 
सीता महल में लौट सकती थीं 
अपने अधिकारों की माँग कर सकती थीं 
पर स्वर्ण आभूषणों को त्याग कर 
फूलों के गहने पहन 
उन्होंने अपने स्वाभिमान का मान रखा 
मातृत्व की गंभीरता लिए 
लव-कुश का पालन किया  ... 
प्रश्नों के विरोध में 
उन्होंने जीतेजी 
धरती में समाना स्वीकार किया 
रानी कहलाने का कोई लोभ उनके भीतर नहीं था !

... 
सीता होना आसान नहीं 
आर्थिक मोह सेअलग हौवा आसान नहीं 
बच्चों के लिए ज़िन्दगी न्योछावर करना आसान नहीं 
एक कठिन तपस्या है !

यदि सच में स्वाभिमान है 
तो सीता बनो 
प्रेम,त्याग,परीक्षा,कर्तव्य 
... इनका अनुसरण करो 
पर अति का विरोध करो !!

09 अगस्त, 2016

होता हर बार यही है





घृणा तो मैं किसी से नहीं कर सकी
खुद को किनारे ज़रूर कर लिया
उनके जैसा बनना मेरे स्वभाव के लिए कठिन था
और निरंतर क्रोध या दुखी होना भी मेरे वश की बात नहीं थी !
मगरमच्छ के आँसू बहाना कहाँ संभव
यहाँ तो अपने आँसू सूख चले हैं
अति' के सीमा अतिक्रमण पर बह निकलते हैं
वरना आंतरिक रेगिस्तान में दहकता है मन
फफोलों को शुष्क आँखों से देखता है
फिर विगत के बसंत को याद करके
आगत को बसंत बनाकर
फूलों की खुशबू से वर्तमान को भर लेता है !!
ऐसे में एहसासों के बादल घिरते हैं
शब्द शब्द बरसते हैं
एक सोंधी सी खुशबू
कई मन
आँखों को छू जाती है
...
कोई सोचता है
मैं शब्दों की धनी हूँ
मैं सोचती हूँ
- मैं समय की ऋणी हूँ
अब कौन जाने !!! - पर होता हर बार यही है
मैं पर्ण कुटी बनाती हूँ
नियति शतरंज खेलती है
अभिमन्यु की मौत पर
कृष्ण की आँखें डबडबाती हैं
रोम रोम पीड़ा से भरता है
फिर भी,
कृष्ण लीला !!!!!!!!!!!!!!!!!!

चलो बच्चे बन जाओ

हर बार कहा कहते आये हैं - बड़े हो जाओ तुम बड़े हो गए तुम बड़ी हो गई तुम भी बड़ी हो गई लेकिन मैं ! जब कहीं से हारी थकी अपने स्वप्निल...