13 जनवरी, 2016

सहज इंसानी आदत ... !!!




सूई है
धागा भी
बस हाथ थरथराने लगे हैं
नज़र कुछ कमज़ोर हो गई है
जीवन को सी लेना
 इतना भी आसान नहीं
खासकर ऐसे में,
जब वह धुंधला नज़र आने लगे
और सूई में धागा पिरोया न जा सके  ...

जो कुछ उधड़ चुका है
उसे बार-बार सामने क्या रखना !
'क्या हुआ था?'
जैसे प्रश्न का क्या औचित्य !
तुम,वो,ये  ...
कोई जौहरी तो नहीं
जो व्याख्या करोगे
तपाओगे
मूल्य निर्धारित करोगे !!
सही-गलत जो भी है
मेरा निर्णय है
और चलो मान लो
मैं साधारण पत्थर हूँ
लेकिन मेरे लिए
मेरी हर साँस
कंचन,हीरा,नीलम,माणिक  ... है
... जिसे मुझे स्वयं तराशना है !!!

यूँ गौर करो
तो तुम्हारी ज़िन्दगी
उसकी ज़िन्दगी भी उधड़ी है
रफू करके देखना
....
आसान नहीं है सीना,
खुद जान लोगे
या जानते भी होगे
पर दूसरे के दर्द को कुरेदते हुए
एक संतुष्टि मिलती होगी
सहज इंसानी आदत  ...  !!!

03 जनवरी, 2016

खैर





नहीं कर सकूँगा लक्ष्यभेद अब केशव
द्रोणाचार्य के आगे नतमस्तक होना भी मुमकिन नहीं
पितामह की वाणशय्या के निकट बैठ लूँगा
पर,
कोई अनुभव,
कोई निर्देश नहीं सुन सकूँगा
निभाऊँगा पुत्र कर्तव्य माता कुंती के साथ
पर
उनकी ख़ामोशी को नज़रअंदाज नहीं कर सकूँगा
पूरे हस्तिनापुर से मुझे रंज है
जिसने भ्राता कर्ण का परिचय गुप्त रखा
और मेरे हाथों ने उनको मृत्यु दी
......
नहीं केशव नहीं
अब मैं गीता नहीं सुन सकूँगा !!!
०००
अर्जुन,
गीता तो मैं कह चुका
सारे प्रश्न-उत्तर दिखला चुका
पुनरावृति की ज़रूरत मुझे है भी नहीं
ज़रूरत है तुम्हारे पुनरावलोकन की  ...
सही है,
कैसे नज़रअंदाज कर सकोगे तुम
कुंती की गलती को
तुम बस द्रौपदी को दाव पर लगा सकते हो
 दीन हीन देख सकते हो चीरहरण !
एकलव्य के कुशल लक्ष्यभेद पर
गुरु द्रोण से प्रश्न कर सकते हो
अभिमन्यु की मौत पर
बिना सोचे संकल्प उठा सकते हो  ...
तुम्हें ज़रूरत ही क्या है
औरों की विवशता समझने की
क्योंकि तुम्हारी समझ से
एक तुम्हारा दुःख ही प्रबल है !!!
अर्जुन,
मैं भी जानता था कर्ण का सत्य
कुंती को दिए उसके वचन के आगे
उसके रथ से मैंने तुम्हें दूर रखा
उसकी मृत्यु का कारण तुम्हें दिया
....
मेरे दुःख
मेरी विवशता का
तनिक भी एहसास है तुम्हें ?
एहसास है तुम्हें मेरी उस स्थिति का
जब मैंने द्रौपदी को भरी सभा में
मुझे पुकारते पाया  ...
धिक्कार है अर्जुन
तुम कभी गांडीव रख देते हो
कभी अपनी सारी सोच
खुद तक सीमित कर लेते हो !!
...
खैर,
कभी कर्ण की जगह खुद को रखो
जिसने समस्त पीड़ा झेलकर भी
कुंती को खाली हाथ नहीं लौटाया
पाँच पुत्रों की माँ होने का दान दिया
अपने पुत्र होने का धर्म इस तरह निभाया  ... 

चलो बच्चे बन जाओ

हर बार कहा कहते आये हैं - बड़े हो जाओ तुम बड़े हो गए तुम बड़ी हो गई तुम भी बड़ी हो गई लेकिन मैं ! जब कहीं से हारी थकी अपने स्वप्निल...