31 दिसंबर, 2016

साल खत्म ! हैप्पी न्यू ईयर















कैलेंडर के पन्ने कम हो गए 
बस एक आखिरी पृष्ठ 
और साल खत्म !
हर साल एक ही जुमला 
"कितनी जल्दी बीत गया  ... "

बीत तो बहुत कुछ गया 
कुछ चेहरे 
कुछ उम्र 
कुछ यादें 
कुछ कहकहे 
कुछ धूप की गुनगुनी खिलखिलाहटें !!! 
... 
न वक़्त है 
न हम हैं 
न ठहराव  ... 
तारीखें तो खुद बदल जाती हैं 
अगर हमें बदलना होता 
तो दिन महीने साल इंतज़ार ही करते रहते !

एक ही जगह पर 
हम इतनी तेजी से दौड़ रहे हैं 
कि बगलवाली कुर्सी को देखने की भी फुरसत नहीं 
कभी देख लो 
तो कुछ नया सा लगता है 
या अचानक लगता है 
धूल जमी है - हटा देना चाहिए !

हर नुक्कड़,चौराहे 
 बातों के शोर में 
अनजान, 
अजनबी से हो गए हैं 
घर में घुसकर भी 
बातों का सिलसिला नहीं रुकता 
रात 
देर से होती है 
सुबह 
बिना नाश्ता किये 
एक रात की तलाश में 
निकल जाती है 
... 
किसी एक दिन 
किसी विशेष दिन का अलार्म बजता है 
एक मेसेज  ... फॉरवार्डेड मेसेज उसकी भरपाई कर देता है 
बस ऐसे ही एक दिन 
कैलेंडर का आखिरी पृष्ठ 
अपने बीतने की सूचना देता है
हम मुँह को आश्चर्य की मुद्रा में लाते हैं 
फिर  ... 
नशे में चीखता है पुराने साल से कोई 
"हैप्पी न्यू ईयर " 
साल की पहली तारीख नशे में 
फिर सड़क पर ज़िन्दगी शीशा चढ़ाये दौड़ती है 
या किसी मेट्रो में 
.... 
कैलेंडर का पहला पन्ना 
बिना मिले पलट जाता है  ... 

23 दिसंबर, 2016

इससे ऊपर कोई परिचय क्या ?





मैं कौन हूँ ?
अपने पापा की बेटी
माँ की बेटी
बहन हूँ
माँ हूँ
और सबसे बड़ी बात
नानी और दादी हूँ
....
इससे अलग
कमल की सीख पापा ने दी
कलम को आशीष माँ से मिला
सूखे पत्ते में जीवन है
ढूँढने का साहस मिला
सबसे छोटी बहन होने से
बड़ों से बहुत कुछ सीखने को मिला
कुछ यूँ :)
"हर अगला कदम पिछले कदम से
खौफ खाता है
कि हर पिछला कदम अगले कदम से बढ़ गया है"
...
माँ होकर
मैंने जीवन को परतों में जाना
अतीत का मर्म भी समझ में आया
बदहवास धुंध में गुम आवाज़ें
मुखर होने लगीं
...
अपनी करवटों से अनभिज्ञ होते
मैंने बच्चों की करवटों से तादात्म्य जोड़ा
दूर होकर भी
उनकी पदचाप सुनती रही
दिल दिमाग की बेचैनी
समझती रही
खुशियों के झरने में भीगती रही  ...

अब तो मैं इनदिनों तोतली भाषा हूँ
अनोखे बोल हूँ
किलकारियों की प्रतिध्वनि हूँ
खिलौनों की पिटारी हूँ
कहानियों की किताबें हूँ
लोरी हूँ
...
इससे ऊपर कोई परिचय क्या ?

20 दिसंबर, 2016

बक बक बूम बूम ...





बक बक बूम बूम
रजाई धुनता हुआ 
धुनिया 
किसी संगीत निर्देशक से 
कम नहीं लगता था !
बर्फ के फाहे जैसी उड़ती 
छोटी छोटी रूइयाँ 
नाक,कान,आँख,सर पर 
पड़ी होती थीं 
जितनी हल्की होती रूइयाँ 
उतनी बेहतर रजाई !
उसके ऊपर 
मारकीन के कपडे का खोल 
रजाई की आयु बढ़ जाती थी 
एक अलग सी गंध आती थी
उस रजाई से  
पूरे परिवार की सुरक्षा होती थी 
उसकी गर्माहट में  
भारी रजाई के नीचे से 
निकलने का 
मन नहीं होता था !
बड़े शहरों में होता है धुनिया 
लेकिन,
वेलवेट की रजाई 
एक से एक दोहर का आकर्षण 
कमरे की रुपरेखा बदल गई 
... ... 
कुछ भी कहो 
वो गर्माहट नहीं मिलती 
ना वह धुन सुनाई देती है 
बक बक बूम बूम  ... 

02 दिसंबर, 2016

कुछ तो रह जाता है ...




पर उसके शरीर से लगे थे
उसके  ...
यानि उस स्त्री के
वह -
जो चाहती थी उड़ना
लेकिन उसे किसी ने बताया ही नहीं
कि उसे उड़ना है
वह उड़ सकती है !

उसे तो गुड़िया घर से उठाकर
दान कर दिया गया
शालीनता,
सहनशीलता का
पाठ पढ़ाया गया
जैसे बड़े बुज़ुर्ग कहते थे
कि लड़के रोते नहीं
वैसे गाँव घर की औरतें
दाँत पिसती हुई कहती थीं
- लड़कियाँ
खी खी खी खी
हँसती भली नहीं लगतीं
हँसने की आवाज़
किसी और को सुनाई दे जाए
तब तो बेशर्मी की हद !!!
ऐसी मानसिकता में
उसे पंख का ज्ञान भला कौन देता !

पता नहीं,
यह दुबके रहने की प्रथा कहाँ से आई
........ !!!

स्त्री को मन्त्र मिला
सती होने का
चिर वैधव्य निभाने का
वंश देने का
इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ानेवाले
जेठ देवर की सेवा करने का
सबको खिलाकर
बचाखुचा खाने का
खत्म हो गया हो खाना
तो भूखे पेट सोने का  ...

मन के विरुद्ध
सीखों का कूड़ा जमता गया
दुर्गन्ध से स्त्री उजबुजाने लगी
पागलों की तरह चीखने लगी
दहलीज़ लाँघकर
सड़क पर दौड़ गई
बिखरे बाल
फड़कते नथुने
एक ज्वालामुखी बन गई वह !
... किसी ने पागल कहा
किसी ने बदजात
किसी ने चुड़ैल-डायन
-
प्यार करनेवाली माँ ने कहा,
"लगता है देवी आ गईं !"

सुनते ही,
पूरा समाज डर गया
चरणों में झुक गया
और बेबस खड़ी
बहुत सारी स्त्रियों को
एक रास्ता मिल गया
भरपेट खाने का
सेवा पाने का
सुख से सोने का  ...

एक घर बाद के घर में
देवी का आना शुरू हो गया
असहय पीड़ा में
वह गुर्राने लगी
रक्ताभ चेहरे में
रक्तदंतिका ही घूरने लगी
और बेबस स्त्री चैन से सोने लगी  ...

इसी नींद ने उसे सोचने को बाध्य किया
बोलने को उकसाया
अपने सपनों के लिए
पंखों को खोलना बताया
...
फिर एक दिन
वह उड़कर मुंडेर पर बैठी
अवलोकन किया
आँगन का
जिसमें वह फिरकी सी खटती थी
फिर देखा दालान की ओर
जहाँ जाने की उसे इज़ाज़त नहीं थी
हाँ खेतों पर
अधेड़ उम्र में
वह रोटियाँ लेकर जा सकती थी
वह भी चुपचाप
!!!
वह नहीं कह सकती थी
कि घर के अंदर वह एक चूल्हा थी
जिसमें लकड़ियाँ फूँककर जलाई जाती थी
काम होने के बाद
पानी डालकर उसे बुझा दिया जाता था
जली लकड़ियों का कोयला भी
काम में आता  ...
बिल्कुल गाय पर लिखे निबंध की तरह
उसका जीवन था !
यह सब सुनाना वर्जित था
यूँ कोई सुनता भी क्यूँ !!!

स्त्री ने आँखें बन्द कीं
और पंखों ने आकाश को नापा
आलोचना,
फिर ताली
फिर होड़
एक शहर से दूसरे शहर
स्त्री अकेली हो गई !

पैरों पर खड़ी होकर भी
उसे प्रश्नों के जवाब देने थे
खाना बनाना सीखा ?
शादी अब तक नहीं हुई ?
रात में कब तक लौटती हो ?
फिर घर ???
जवाब दिया उसने
लेकिन
सुननेवालों को तसल्ली नहीं मिली
ज़िद ने उसे उसके भीतर बन्द कर दिया
पंख होते हुए भी
उड़ते हुए भी
वह एक अजीब से पिंजड़े में कैद हो गई
अकेलेपन की तीलियों में
लहूलुहान होने लगी
....
एक स्त्री
पहचान लेती है अपना वजूद
दिखा देती है अपना वजूद
खाइयों को पार कर जाती है
हर क्षेत्र में उड़ान भरती है
फिर भी,
कुछ तो रह जाता है
लेकिन क्या !!!!

11 नवंबर, 2016

प्रत्याशित अप्रत्याशित स्थिति




कभी लगता है सन्नाटा
कभी शोर !
कभी महसूस होता है
हो गई है मिट्टी
मेरे दिलोदिमाग की
 - सख्त और बंजर !
या फिर कोई निरन्तर
एक ही जगह की मिट्टी को
हल्का बनाये जा रहा है  ... !
इतना हल्का
कि खुद के होने पर संदेह हो !!

अजीब अजीब से दृश्य पनपते हैं
मैं आग का सैलाब बनकर बहती हूँ
कभी नदी में जमी बर्फ होती हूँ
अचानक
पतली रस्सी पर
डरती
डगमगाती
आगे बढ़ने का प्रयास करती हूँ
सोचती हूँ,
मैं तो नट नहीं
फिर कैसे संभव कर पाऊँगी !
तपते
लहकते अंगारों पर
सत्य के लिए चलती हूँ
आश्चर्य
और अहोभाग्य
कि फफोले नहीं पड़ते
...
भय भी  मेरा सत्य हुआ है
दुर्भाग्य भी
सहमी काया
चीखता स्वत्व
अडिग साहस
जंगल के अँधेरे में
भयानक आवाज़ों के मध्य से
मेरा "मैं" पार हुआ है
किनारा पाकर
पुनः भँवर में पड़ी हूँ
 कई बार यह भँवर
अकस्मात् आया है
कई बार मैंने खुद बना डाला है
जानते-समझते भी मूर्खता !

महसूस होता है
ये सारी घटनाएँ
मेरे निकट
मेरे ही लिबास में
रस्सी कूद रही है  ...
कई बार इतनी तेज
कि घण्टी बजने की आवाज़ सुनाई नहीं देती
ज़रूरी सा काम
अगले दिन की प्रतीक्षा में
लौट जाता है
कह देता है,
"घर में कोई था ही नहीं  ... "

मैं थी
मैं हूँ
अरे, कहाँ जाऊँगी
...
कोई सर सहलाता है
मैं टिका लेती हूँ
अपना सर
पीछे
सुनने लगती हूँ आवाज़ें
आवाज़ों के बीच सन्नाटे को
.... प्रत्याशित
अप्रत्याशित स्थिति में   ....

04 नवंबर, 2016

प्रतिनायक




नायक खलनायक के मध्य
होता है एक चरित्र
प्रतिनायक का
घड़ी के पेंडुलम की तरह  ... !!!
कभी वह नायक से भी बढ़कर हो जाता है
कभी इतना बुरा
कि उसकी उपस्थिति भी नागवार लगती है
परिस्थितियों में उलझा
वह करने लगता है उटपटांग हरकतें
कुछ ना सही
तो जोकर बनकर हँसाने लगता है
जीत लेने के लिए सबका विश्वास
बन जाने को सबका नायक  ...

दरअसल वह तुरुप का पत्ता होता है
जब जहाँ जैसी ज़रूरत
वैसा इस्तेमाल !
बिना उसके ज़िन्दगी चलती नहीं
चल ही नहीं सकती
समय,
हुजूम
हमेशा एक सा नहीं होता
और प्रतिनायक हर डाँवाडोल स्थिति में
खरा होता है
नहले पे दहला है उसकी उपस्थिति  ...

लेकिन प्रतिनायक
इसे समझ नहीं पाता
वह कभी खुद को ज़रूरी
तो कभी गैरज़रूरी पाकर
अन्यमनस्क सा हो जाता है !
वह स्वीकार ही नहीं कर पाता
कि वह सामयिक ज़रूरत है
और ज़रूरी होना बहुत मायने रखता है
बिल्कुल रोटी,कपड़ा और मकान की तरह !
कई बार
वह नहीं समझना चाहता
कि अति सर्वत्र वर्जयेत
जैसे,
भूख न हो तो रोटी भी नहीं भाती
लेकिन इससे उसकी ज़रूरत नहीं मिटती
वैसे ही
उसका असामयिक अभिनय
किसी को नहीं भाता
लोग भी दुखी
प्रतिनायक भी दुखी !!!
...
कुछ अच्छा
कुछ बुरा
कुछ हास
इस तालमेल के साथ ज़िन्दगी चले
तभी ठीक है
अन्यथा,
नायक कब खलनायक हो
खलनायक कब नायक बन जाए
कहना
समझना
और उसे सहजता से ले पाना कठिन है

सौ बातों की एक बात -
थोड़ी मिलावट ज़रूरी है दोस्त :)

26 अक्तूबर, 2016

यूँ ही कुछ कुछ




इतनी भी शिकायत ना रखना मुझसे
कि मैं  दूर चली जाऊँ
मिलने के बहाने बने रहें तो अच्छा होता है
 ...

क्या मिला तुम्हें भगवान् के आगे खड़े रहकर
मैं तो तुम्हारा द्वार खटखटाकर लौट आई  हूँ  ...

मेरी बेबसी की आलोचना तो तुमने जी भर के की
कभी अपनी मान्य हैसियत का मुआयना भी कर लेना   ...

कितना फर्क है तुममें और हममें
विदा के वक़्त तुमने सबके हाथ में पैसे रखे !
मैंने सर पर हाथ रखा
और दुआ देकर आई हूँ  ...

तुम्हें लगा था तुम खरीद लोगे मुझे भी
मुड़कर देखना जरा पीछे
मैं इस पैसे की औकात को ठुकरा के यहाँ आई हूँ !

दुःख है इस बात का - तुम समझोगे मुझे जब तक
तुम्हारे हिस्से का सौभाग्य बहुत दूर चला जाएगा

परंपरा की बातें तुम दावे से किया करते हो
ये अलग बात है कि तुम्हें निभाना नहीं आया

आगे बढ़कर हाथ मिलाने में मुझे कोई तकलीफ नहीं है
लेकिन तुम्हारे दम्भ को हवा देना मुझे मंज़ूर नहीं है  ...

माना छत तो उपरवाले ने तुम्हें बहुत सारी दी
गौर करना तुम्हारे पैरों के नीचे कोई ज़मीन नहीं है  !!!

21 अक्तूबर, 2016

समय के साथ दृष्टिकोण बदलते हैं




न प्रसिद्धि टिकती है
न बेनामी ज़िन्दगी
कौन कब तक याद रखता है भला !

राम,रहीम,कृष्ण,कबीर,
सीता,यशोधरा,कैकेयी
सब अपने दृष्टिकोण हैं
बोलो तो अनगिनत बातें
चुप रहो तो नदी है या नहीं
क्या फर्क पड़ता है !
हाँ,
कोई उधर न जाए
तो संदेहास्पद होता है क्षेत्र
संदेह के आगे
विशेषताओं की ज़रूरत क्षीण होती है !

आज तुम शिखर पर हो
तो तुम उदाहरण हो
कल शिखर किसी और का होगा
उदाहरण कोई और होगा !

इतिहास पर उकेरे भी जाओ
तो कौन जाने
कब कैसी विवेचना हो
समय के साथ दृष्टिकोण बदलते हैं
और उनके मायने भी  ... !!!

17 अक्तूबर, 2016

उम्मीद ज़िंदा है




जहाँ भी उम्मीद की छाया दिखती है
साँकल खटखटा ही देती हूँ
सोचती हूँ एक बार
खटखटाऊँ या नहीं
लेकिन अब पहले जैसी दुविधा देर तक नहीं होती
उम्र की बात है - !

यौवन की दहलीज़ पर
होठ सिल ही जाते हैं
भय भी होता है
... जाने क्या हो !
"ना"
या कोई भी जवाब नहीं मिलना
मन को कचोटता है
खुद पर विश्वास कम होता है !

उम्र की बरगदी जड़ें
अब भयभीत नहीं करतीं
मेरे अंदर कुछ पाने की धुन है
और कब कहाँ से
कौन सी धुन
मेरी जिजीविषा की प्यास बुझा दे
सोचकर
हर दिन कोई अनजान साँकल खटखटा देती हूँ
उम्मीद ज़िंदा है
कब अमर हो जाए
क्या पता  ...

14 अक्तूबर, 2016

निराकार आकार




मैं ईश्वर नहीं
पर ईश्वर मुझमें है
वह रोज हथौड़ी छेनी लेकर
अपना निर्माण करता है
बचे खुचे पत्थर को भी वह नहीं फेंकता
विचारों के गुम्बद बनाता है
और सतर्कता की घण्टी टाँगकर
कुछ नए सामान लाने निकल पड़ता है  ...

हर दिन वह अपनी संरचना बदलता है
ताकि उसकी संभावना कभी खत्म न हो
वह वाणी बनकर
मेरे गले की नसों में प्रवाहित होता है
मेरे एकांत में
मुझे मेरी मायावी शक्तियों तक ले जाता है !
मैं भयभीत
वह स्तब्ध  !!!
त्रिनेत्र की शक्ति क्यूँ नहीं है जाग्रत
सोच सोचकर
वह तराशता है खुद को
चाहता है,
मैं बन जाऊँ जौहरी
हीरे को पहचान सकूँ
...
मैं उसकी कारीगरी के आगे नतमस्तक
 खुद से अजनबी
युगों से परे
युगवाहक को लिए
मूक होती हूँ
रात गए छेनियों की आवाज़ आती है
मन के कारागृह में
एक मूर्ति बनती रहती है
प्रबल हो जाती है चेतना
मूसलाधार विचारों के मध्य
निराकार आकार
यज्ञ करता है

 ....... अग्नि में तपकर मैं
कुंदन होती जाती हूँ
स्वाहा होता जाता है स्वार्थ
मोक्ष नज़दीक होता है
रह जाता है निनाद
- शून्य का !

08 अक्तूबर, 2016

दूसरों के हादसे,अपने हादसे ...





दूसरों के हादसे
शब्द शब्द आँखों से टपकते हैं
उसे कहानी का नाम दो
रंगमंच पर दिखाओ
या तीन घण्टे की फिल्म बना दो  ... !
नाम,जगह,दृश्य से कोई रिश्ता बन जाए
ये अलग बात है !
पर हादसे जब अपने होते हैं
तो उसे कहने के पूर्व
आदमी एक नहीं
सौ बार सोचता है
एक पंक्ति पर
सौ अनुमान
सौ प्रश्न उठते हैं
हादसे सिमटकर एक कोने में होते हैं !
सच के आगे
अनगिनत शुभचिंतकों की रेखा होती है
कि उसे ना कहा जाए !
हादसे व्यक्तिगत होते हैं
उन्हें सरेआम करना सही नहीं !!
अनजान हादसों को कहना-सुनना
अलग बात है
!!!
कितनी अजीब बात है
लेकिन सच यही है -
कि
आत्मकथा को कितने लोग निगल पायेंगे
यदि उसमें एक चेहरा उनका भी हो तो !

04 अक्तूबर, 2016

पुनरावृति का हस्ताक्षर




हम हर दिन न कुछ नया लिखते हैं,
न कहते हैं
सबकुछ पुनरावृति का हस्ताक्षर है !
बहुत सी बातें
जो आज हम लिख लेते हैं
कह देते हैं
उसमें पहले भी जीते थे
बस कहने का सलीका नहीं आया था
या यूँ कहें,
कह पाने की उम्र नहीं थी
नहीं बोलने' का दबाव था !
अनुभवों का दलदल
भंवर
तैरने का अथक प्रयास
किनारों को छूने की कोशिश
किनारों को छूने की ख़ुशी
सबकुछ बचपन से होता है
शहर बदलता है
रिश्ते बदलते हैं
...
सोच वही होती है
परिपक्वता आती जाती है
उम्र दर उम्र
हम हस्ताक्षर करते हैं
तब तक
जब तक हाथ न काँपने लगे
!!!

01 अक्तूबर, 2016

गलत कौन होता है भला




जी गई कहानियों की पांडुलिपि
हर किसी के मन में होती है
कोई सुना देता है
कोई छुपा लेता है
कोई बीच के पन्ने फाड़ देता है  ...

पृष्ठभूमि सबकी
लगभग एक सी होती है
हादसे,रिश्ते,  ...
बस पृष्ठ की किस संख्या पर वह दर्ज है
इसीका फर्क होता है
आस्तिक नास्तिक हो जाता है
नास्तिक आस्तिक
जीवन चक्र सारे खेल दिखाता है !

गलत कौन होता है भला
अपनी जगह पर सब सही होते हैं
सारे दृश्यों के कान उमेठ दो
तो सबकुछ अपने पक्ष में होता है
तर्क,कुतर्क का महाजाल है
जितना बोलोगे
उतना फँसोगे  ...

बस मानकर चलो
कि होनी का पासा सबके लिए होता है
ईश्वर भी मजबूर
किंकर्तव्यविमूढ़
क्रोध में होता है
शिव का तांडव यूँ ही नहीं होता !!!

29 सितंबर, 2016

आदिशक्ति



माँ कमज़ोर नहीं होती
लेकिन माँ माँ होती है
एक तरफ मोम सी आँखें पिघलती हैं ज़रूर
पर यकीनन वह अँधेरे से लड़ती है  ... !
डर जाना
डर लगना तो एक आम बात है
लेकिन आग के दरिया को
वह हर हाल में पार करती है
...
माँ अपने आप में दुआओं का धागा है
मन्नत पूरा करनेवाला वृक्ष भी स्वयं
बाँध देती है अपने आप को
हर तने से
अधूरे मन्त्रों का जाप
वह इतनी निष्ठा से करती है
कि सरस्वती खुद
साथ साथ मंत्रोच्चार करती हैं

माँ ध्यानावस्थित होती है
चलायमान दिखती है
महिषासुर का वध करती है
गणेश की रचना करती है
माँ प्रकृति के कण कण से
आशीषों का शंखनाद करती है
.... बावजूद इसके
वह दिखती है कई बार काँपती हुई
लेकिन गौर करना -
हर कम्पन में रक्षा मन्त्र होता है
तभी तो
वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की आदिशक्ति है।

27 सितंबर, 2016

अपनी धुन


मैं भोर की पहली किरण बनने की धुन लिए
घोसले में सुगबुगाती हूँ
देखती हूँ चहचहाते हुए विस्तृत आकाश
पंख फड़फड़ाते हुए
दाने की तलाश में
डाली डाली होकर
सतर्क दृष्टि लिए
उतरती हूँ धरती पर
निरंतर दाने इकट्ठे करती हूँ
बच्चों की भूख बहुत मायने रखती है
....
 बच्चों के पंख सशक्त हैं,
फिर भी शिकारी शिकारी है
माँ माँ है   ...
क्षमता जब तक है
विस्तार नापना है
रसोई की आग बनना है
पानी की किल्लत हो
तो आँसुओं के अनुवाद से
प्यास बुझाना है !

सूरज जब सिर पे होता है
तात्पर्य यह
कि जब उसकी प्रचंडता बीचोबीच होती है
मैं बरगद
या फिर
बादल का एक टुकड़ा बनकर
दिनचर्या में ढल जाती हूँ
थकान के गह्वर से
ऊर्जा लेकर
ढलते सूरज से होड़ लगाती हूँ
कहती हूँ,
शाम रात के मिलन में
मैं अब भी पहली किरण के राग परिधान में हूँ
तुम पूरब से पश्चिम तक प्रखर हो
मैं उत्तर और दक्षिण से भी निःसृत हूँ !

भूख सिर्फ पेट की नहीं होती
प्यास सिर्फ गले की नहीं होती
जिह्वा सूखती है
जब -
अनगिनत अनर्गल प्रश्नों का सैलाब
नागपाश की तरह जकड़ लेता है
घोंसले में सुगबुगाकर भी
चहचहाहट पर नियंत्रण रखना होता है
गीता के पन्नों को छूते हुए
झूठ बोलना होता है
ब्रह्ममुहूर्त की रक्षा में
सूर्य को निश्चित समय पर अर्घ्य देने के लिए
सपनों के मानसरोवर तक उड़ना होता है  ...

मैं कभी वाष्पित होती हूँ
कभी बाँध तोड़ उमड़ती हूँ
पर इन सबसे परे
एकमुखी रुद्राक्ष मेरे मन में उगता है
सम्पूर्ण वृक्ष
मेरे मान्त्रिकआह्वान से सम्पूर्णता को पाता है
मेरे विश्वास का दसवाँ रूप
परिस्थितिजन्य लंका को अग्नि के हवाले करता है
भक्त और पूज्य दोनों होता है  ...

मैं चाँद की माँ बन
उसके अनुसंधानिक सत्य पर
मरहम लगाती हूँ
ताकि वह अपने दोनों पक्ष
 - शुक्ल एवम कृष्ण की महत्ता याद रखे
कौन उस तक आया
किसने पहला कदम रखा
कैसे उसका सहज रिश्ता खत्म हुआ
इस उधेड़बुन के दर्द में वो ना रहे
... बच्चे मासूम होते हैं
और वे आज भी उसे देख किलकते हैं
मामा' सुनकर ही देखते हैं
आज भी ईद और पूर्णिमा का चाँद
लोगों की आँखों में थिरकता है
उसका गुम होना
कृष्ण को ले आता है  ...

फिर मैं बाँसुरी बन
कृष्ण की पकड़ में होती हूँ
राधा को छेड़ती हूँ
अपनी धुन पर इतराती हूँ  ...

20 सितंबर, 2016

बुद्धि का शस्त्र उठाओ




कृष्ण ने कहा,
"अर्जुन उठो
गांडीव उठाओ
अपने धर्म को निभाओ
अन्यथा,
यह सच है
कि मैं यदि तुम्हें गीता सुना सकता हूँ
तो रथ का पहिया उठाकर
सबको परास्त कर सकता हूँ
शस्त्र उठाने का एक मौका तक नहीं दूँगा
यदि मैं अपने 'मैं' पर आ गया
... !!!
पर,हर न्याय के लिए
पात्रता अपनी होती है
ईश्वर सारथि होते हैं
!
अर्जुन,
साथ वो नहीं होता
जो तुम्हें तूफ़ान से बाहर ले आये
सही साथ वह है
जो तुम्हें तूफानों को चीरकर बढ़ना बताये  ...
...
मृत्यु सबकी तय है
डरो या निडर रहो
उसे आना ही है
वक़्त निर्धारित है
आज नहीं तो कल
तो उठो,
व्यक्तिविशेष के लिए नहीं
अन्याय के विरुद्ध शंखनाद करो
शस्त्र उठाओ।

सभा में जो कुछ भी हुआ
क्या वह तर्कसंगत
या न्यायसंगत था ?
पांचाली की चीख
सभा की ख़ामोशी
और तुमसबो का बुत बने रहना
इतिहास के पन्नों को
सुलगते प्रश्नों से रेखांकित करता है
पार्थ
युद्ध का आरम्भ सत्य के लिए होता है
युद्धोपरांत सत्य उजागर होता है
इसलिए उठो
और बुद्धि का शस्त्र उठाओ  ...

16 सितंबर, 2016

एक रहस्यात्मक पन्ना




मन .... एक रहस्यात्मक पन्ना 
जिसे दूसरा लाख पढ़ ले 
अधूरा ही होता है 
अपने रहस्य को खुद से बेहतर 
कोई नहीं जानता !
मन सपने बनाता है
पर दूसरी छोर पर
अज्ञात,ज्ञात आशंका लिए
सपनों के टूट जाने की दर्दनाक स्थिति को जीता है !
शरीर के परिधान से
मन का परिधान मेल नहीं खाता
लाल रंग भरनेवाला चरित्र
श्वेत की चाह में जीता है
इसे जान पाना असम्भव है
चाह बता भी दे व्यक्तिविशेष
तो भी .....
चाह स्थाई है या अस्थाई
इसे समझना मुश्किल है !
ज़रूरी नहीं न
कि हरी भरी धरती ही सबको भाये
बंजर धरती का आकर्षण
कर्मठ योजनाओं को मूर्त रूप देने के
अनगिनत विकल्प देती है !
अपनी मंशाओं को जीने के लिए
कीमती,दुर्लभ उपहार कितने भी दिए जाएँ
मन उसे एक नहीं
कई बार अस्वीकार करता है
रख देता है उसे किसी कोने में
दे देता है किसी और को
तरीके में लौटाई गई मुस्कान
मन से अलग थलग
सच्चाई से कोसों दूर होती है !
मन कितना भी सोचे
पर जीता है वह अपने को ही
नफरत,प्यार,अधिकार,उदासीनता
उसकी अपनी होती है
वर्षों साथ रहकर भी
वह साथवाले से दूर
बहुत दूर होता है
साथ दिखावा है
मन तठस्थ है
प्रत्यक्ष का चश्मदीद गवाह
अप्रत्यक्ष मन होता है
उसकी अप्रत्यक्ष गवाही में
उसका न्याय होता है
जहाँ कानून की देवी आँखों पर पट्टी नहीं बांधती
......
हाँ - ज़ुबान पर संस्कारों की असंख्य पट्टियां होती हैं
जिसे खोलने का साहस
पूर्णतः
किसी में नहीं होता
........... मुमकिन भी नहीं ....
कहीं मोह,कहीं भय,कहीं जिद
इन सारे बन्धनों में
उठते क़दमों को
मन अपने हिसाब से तय करता है
शकुनी के दुर्लभ पासे
उसके अन्दर हर वक़्त जुआ खेलते हैं
कभी खुद से
कभी औरों से
कभी ज़िन्दगी से ....
अपनी रहस्यात्मक सुरंगों से
अनभिज्ञ भिज्ञ मन
सुरंगे बनाता जाता है ...
हर दिन तो वह स्वयं सभी सुरंगों में नहीं चल पाता
तो कई योजनायें धरी की धरी रह जाती हैं
क्योंकि सभी रहस्यों का पटाक्षेप करता यमराज
मन को समझने की जद्दोजहद नहीं उठाता
और पन्ने - अधलिखे,अधपढ़े,अनपढ़े रह जाते हैं
कई रहस्यों को दफ़न किये हुए !!!
...................................................कैसे पढोगे ???
कैसे जानोगे -
तुम मैं हमसब अपने मन में उलझे हुए हैं
मकड़ जाले से अधिक महीन जाल बुनते हुए
और रहस्यों से भरी भूलभूलैया में
खुद में खुद को खोते हुए ...
नियति यह
कि पन्ने फाड़े भी नहीं जा सकते
शायद तभी
मन की इस दयनीय स्थिति से मुक्त होने का मंत्र है
'राम नाम सत्य' ....

13 सितंबर, 2016

मन की विक्षिप्तता परिवर्तन की स्थिति है



जब जहाज डूबने का मंज़र होता है
तो निश्चेष्ट मन शरीर से गतिशील होता है
एक नहीं
खुद पर आश्रित कई यात्रियों को बचाता है
क्योंकि और कोई हो न हो
देवता साथ होते हैं
उनके साथ भी जो बचाते हैं
और उनके साथ भी जो बच जाते हैं !

मन की तूफानी स्थिति में
कुछ भी बेकार नहीं होता
हर दबी हुई चीख
जम गई धूल को
 करीने से साफ़ करती है
खिड़की दरवाजों को
बेबस होकर ही सही
सख्ती से बन्द करती है
फिर अँधेरे कमरों में
हौसलों के दीप प्रज्ज्वलित करती है  ...

हमें लगता है -
"हम पागल हो रहे हैं"
पर दरअसल हम
पागलपनी से बाहर निकल रहे होते हैं !
अच्छी भावनाओं के अतिरेक पर
नियंत्रण ज़रूरी होता है
और यह तभी होता है
जब हम औंधे मुँह गिरते हैं
आश्चर्य का रक्त तेजी से प्रवाहित होता है
प्रश्नों का प्रलाप होता है
सबकुछ व्यर्थ लगता है
लेकिन सुबह का सूरज
तभी अँधेरे को चीरकर निकलता है !!

जुगनू राह दिखाता है
विनम्रता सुकून देती है
लेकिन अँधेरे को दूर करने के लिए
सूरज का आना ज़रूरी है
अपमान के आगे विनम्रता
महज कायरता है !

जब तक रहे श्री कृष्ण संधि प्रस्ताव लिए
दुर्योधन ने उनको बाँधने की धृष्टता दिखाई
एक विराट स्वरुप के आगे
पूरी सभा सकते में आई
...
कुरुक्षेत्र एक तूफ़ान था
अर्जुन के मन के हर उथलपुथल के आगे
कृष्ण खड़े थे
विश्वास रहे
तूफ़ान,
मन की विक्षिप्तता
 परिवर्तन की स्थिति है
बन्द रास्तों की चाभी इसी तरह मिलती है  ...

10 सितंबर, 2016

इसे हार नहीं कहते



मैं तो ज़िंदा हूँ 
फिर खाली हो गए कमरे सा 
मेरा अंदरूनी हिस्सा गूंज क्यूँ रहा है !
भूलभुलैये सा बन गया मस्तिष्क 
जाने किन बातों के जाल में 
खो सा गया है !
... 
ढूँढ रहा है मुझे 
मेरे नाम को 
मेरी मेडल सी हँसी को 

पीछे से एक अपनी सी आवाज़ गूँजती है 
... सेल्फ रेस्पेक्ट को दाव पर मत लगाओ 
... सन्न सा मन 
एक नज़र सेल्फ रेस्पेक्ट पर डालता है 
फिर ताखे पर रखे मोहबंध पर 
जाने मन बड़बड़ाता है 
या ज़ुबान से कुछ सुलझे-उलझे शब्द निकल रहे हैं !
जो भी हो, 
इसे हार नहीं कहते 
जीते हुए के साथ 
जो बाज़ी खेली है दूसरों ने 
वह सरासर बेईमानी है !

09 सितंबर, 2016

"खिड़की से समय"





















कई बार बहुत कुछ ऐसा होता है, जो जानबूझकर नहीं होता, पर हम मान लेते हैं और दुखी हो जाते हैं  ,,, पर, इस दुखी होने में भी बहुत फर्क है, एक में हम चुप्पी साध लेते हैं और संबंधों की इतिश्री कर लेते हैं, जो दरअसल सिर्फ इम्तिहान पर टिके होते हैं,  ... पर एक दुःख में हम शिकायत कर लेते हैं, जो अधिकार है।
कुछ ऐसा ही अधिकार जताया अरुण चन्द्र राय ने  ... कुछ इस तरह,

"namaskar rashmi ji.. apne meri kitab par ek shabd bhi nahi kahe... और विडम्बना देखिये  कि मेरी औसत सी कविताओं के संग्रह को फेमिना ने साल के चुनिंदा किताब में शामिल कर लिया है।  बधाई तो दे दीजिये। "
बधाई तो मैंने दी थी, लेकिन खिड़की से बाहर समय इतनी द्रुत गति से चल रहा था मेरी अपनी जिम्मेदारियों के मध्य कि मुझे याद नहीं रहा कि उन्होंने अपनी किताब "खिड़की से समय" मुझे भेजी थी, पता मैंने ही दिया था  ... लेकिन नानी / दादी बनने के क्रम में सब भूल गई थी।  

अरुण जी ने ही याद दिलाया कि किताब तो जनवरी में ही आपने पाने की सूचना दी थी, शर्मिंदा भी हुई लेकिन एक अनुभवी ही खिड़की से समय को देखता है और दूसरे के समय को समझ पाता है !  ... खैर, जहाँ मैं किताबों को सहेजकर रखती हूँ, वहाँ से इस किताब को निकाला, सच कहूँ  - थोड़ा डर लगा था, कहीं मैंने खो तो नहीं दिया।  अपनी तरफ से मैं कभी कोई ग़लतफ़हमी नहीं बुनना चाहती, बन जाए तो दुःख होता है !
अरुण जी ने इस किताब में बड़े स्नेह से लिखा है,
"खिड़की से आता हुआ समय
लेकर आता है
नई रौशनी
नई आशाएँ
नई उम्मीद  ...
इस किताब को मैं कैसे भूल गई !

समीक्षा तो मैं करती नहीं, बस अनुरोध करुँगी सबसे कि "खिड़की से समय" को पढ़िए  कील पर टँगी बाबूजी की कमीज से रूबरू होइए    ...
हर रचना में अरुण के जीए हुए पल उभर कर आये हैं,

ज्योतिपर्व प्रकाशन से प्रकाशित इनकी पहली कविता संग्रह "खिड़की से समय" को फेमिना हिंदी ने साल के बेहतरीन कविता संग्रह के रूप में चुना है और सितंबर माह में कवर स्टोरी में स्थान दिया है।

ईश्वर आपकी कलम को और निखारे :)

07 सितंबर, 2016

अंदर की कमज़ोरी कठोर ही जानता है




कमज़ोर होना नहीं चाहना
वैसा ही है
जिस तरह -
वृद्धावस्था,
रुग्णता,
मृत्यु से विक्षुब्ध सिद्धार्थ
मोहबंध से निकल गए
यशोधरा और राहुल को छोड़कर
!!!
क्या सच में ?
मन के भीतर
इस रिश्ते से निकल सके सिद्धार्थ बुद्ध होकर ?

निकल जाते तो ज्ञान पाकर
घर न लौटते
यशोधरा की व्यथा की फटकार न सुनते
राहुल को
यशोधरा को
अपने साथ न ले जाते !

ज्ञान सत्य का था
बुद्ध को सत्य मिला
सत्य मृत्यु है
जीवन क्षणिक है
तो मोहबंध भी एक सत्य है
जो कमज़ोर बनाता ही है
ऊपर की कठोरता
कुछ भी कहे
अंदर की कमज़ोरी कठोर ही जानता है
नारियल की तरह  ...

29 अगस्त, 2016

मेरे हिस्से की धूप




कोशिश की थी कभी कभी
पर मैं एहसासों की समीक्षा नहीं कर पाई 
शब्दों की गंगा जब जब मेरे आगे आई 
मैं एक बूंद में समाहित हो गई। 
शहर अलग 
किनारे अलग 
तो मैंने नाम से दोस्ती की 
जिस जिस की कलम से गंगा अवतरित हुई 
मैं समाधिस्थ हो गई !
आज आलोड़ित गंगा 
"मेरे हिस्से की धूप" बन 
सरस दरबारी के नाम से 
मेरे आगे बह रही है 
और कह रही है -

"यह हथेलियाँ  ... सच्ची हमदर्द होती हैं 
बिना कहे हर बात जान लेती हैं "

सरस दरबारी की कलम से निकली गंगा से अवतरित ये एहसास बहुत कुछ कहेंगे आपसे  ... 

अमेज़न = http://www.amazon.in/dp/9386027097
फ्लिप्कार्ट = https://www.flipkart.com/item/9789386027092
रेडग्रैब = http://bit.ly/2bpncri

15 अगस्त, 2016

तपस्या






कलयुग में सबने सीख दी - "सीता बनो"
यह सुनकर 
स्त्री या तो मूक चित्र हो गई 
या फिर विरोध किया 
"क्यूँ बनूँ सीता ?
राम होकर पुरुष दिखाये !"
.... 
एक उथलपुथल ही रहा यह सुनने में 
!!!
आज इस सीख का गूढ़ रहस्य समझ आया 
... 
सीता महल में लौट सकती थीं 
अपने अधिकारों की माँग कर सकती थीं 
पर स्वर्ण आभूषणों को त्याग कर 
फूलों के गहने पहन 
उन्होंने अपने स्वाभिमान का मान रखा 
मातृत्व की गंभीरता लिए 
लव-कुश का पालन किया  ... 
प्रश्नों के विरोध में 
उन्होंने जीतेजी 
धरती में समाना स्वीकार किया 
रानी कहलाने का कोई लोभ उनके भीतर नहीं था !

... 
सीता होना आसान नहीं 
आर्थिक मोह सेअलग हौवा आसान नहीं 
बच्चों के लिए ज़िन्दगी न्योछावर करना आसान नहीं 
एक कठिन तपस्या है !

यदि सच में स्वाभिमान है 
तो सीता बनो 
प्रेम,त्याग,परीक्षा,कर्तव्य 
... इनका अनुसरण करो 
पर अति का विरोध करो !!

09 अगस्त, 2016

होता हर बार यही है





घृणा तो मैं किसी से नहीं कर सकी
खुद को किनारे ज़रूर कर लिया
उनके जैसा बनना मेरे स्वभाव के लिए कठिन था
और निरंतर क्रोध या दुखी होना भी मेरे वश की बात नहीं थी !
मगरमच्छ के आँसू बहाना कहाँ संभव
यहाँ तो अपने आँसू सूख चले हैं
अति' के सीमा अतिक्रमण पर बह निकलते हैं
वरना आंतरिक रेगिस्तान में दहकता है मन
फफोलों को शुष्क आँखों से देखता है
फिर विगत के बसंत को याद करके
आगत को बसंत बनाकर
फूलों की खुशबू से वर्तमान को भर लेता है !!
ऐसे में एहसासों के बादल घिरते हैं
शब्द शब्द बरसते हैं
एक सोंधी सी खुशबू
कई मन
आँखों को छू जाती है
...
कोई सोचता है
मैं शब्दों की धनी हूँ
मैं सोचती हूँ
- मैं समय की ऋणी हूँ
अब कौन जाने !!! - पर होता हर बार यही है
मैं पर्ण कुटी बनाती हूँ
नियति शतरंज खेलती है
अभिमन्यु की मौत पर
कृष्ण की आँखें डबडबाती हैं
रोम रोम पीड़ा से भरता है
फिर भी,
कृष्ण लीला !!!!!!!!!!!!!!!!!!

10 जुलाई, 2016

चयन आपका






किसी का होना सकारात्मक लगता है 
किसी की उपस्थिति नकारात्मक एहसास देती है 
नकारात्मक गति से 
समय रहते बचने का प्रयास बुद्धिमानी है 
भले ही रक्त संबंध क्यूँ न हो 
.... इस स्थिति से निकलना 
भयानक असमंजसता की स्थिति है 
पूरी ज़िन्दगी उतार-चढ़ाव, 
जानलेवा खाई से गुजरती जाती है 
दिनचर्या पर प्रभाव 
बच्चों पर प्रभाव 
सबसे अधिक अपने व्यक्तित्व पर ग्रहण !!!
... 
इस चक्रव्यूह में 
अपना मन 
अपना दिमाग ही अधिक मारता है 
अपने करीबी मारते हैं 
और असली मृत्यु  ... बहुत दूर होती है !

ज़िन्दगी को जीने के लिए चयन आपका  
- सिर्फ आपका है 
खुली हवा के लिए खिड़की खोलें 
या फिर मन की कमज़ोरी का विषपान करें  ... 

20 जून, 2016

लापता परखचे




एक विस्फोट
... और शरीर के परखचे 
इधर से उधर बिखरे हुए 
सारे टुकड़े मिलते भी नहीं !!

लापता व्यक्ति 
न जीवित 
और  ... मृत तो बिल्कुल नहीं !!

खुली आँखों के आगे 
एक टुकड़े की तलाश 
और इंतज़ार 
आँखों की पोरों में सूख जाती है 
लुप्त गंगा सी !!

लेकिन उस विस्फोट में, 
जहाँ शरीर,
मन के परखचे दिखाई देते हैं 
उन्हें न जोड़ पाने की तकलीफ भी 
नहीं जोड़ी जा सकती !

दिनचर्या,
पेट की आग,
जीवन के कर्तव्य  
और टुकड़ों को सीने की कोशिश  ... !!!

अपने मन से तो कोई लापता भी नहीं होता 
खुद को देखते हुए 
अनजान होकर चलना 
त्रासदाई है !
होकर भी ना होने की विवशता 
ये होते हैं लापता परखचे 
जिनकी न कोई चीख होती है 
न कोई आहट 
न खुशी 
न दर्द 
सिर्फ एक सन्नाटा  ... 

साल,तारीखें  ... मन के अंदरूनी परखचों पर लिखे होते हैं 
विस्फोट की भयानक आवाज़ें 
रिवाइंड,प्ले होती रहती हैं 
एक एक टुकड़े 
कुछ न कुछ कहते रहते हैं 
सुनते हुए बहरा बना आदमी 
हँसता भी है 
व्यवहारिकता भी निभाता है 
लेकिन  ... परखचों से मुक्त नहीं होता !!!

14 जून, 2016

मैं स्त्री






मैं स्त्री
मुझे दी गई है व्यथा
पर मैं व्यथा नहीं हूँ
मुझमें आदिशक्ति का प्रवाह है
है अपने स्व' के लिए धरती में समाने की क्षमता
प्रश्नों के घेरे में राहुल को पालने का मनोबल  ...
मेरे आँसू
मेरी कमज़ोरी नहीं
मंथन है
जीवन-मृत्यु का
यदि मैं माँ; हूँ
तो मैं जीना चाहती हूँ
अपने सम्पूर्ण कर्तव्यों के लिए
यदि मैं परित्यक्ता हूँ
तो मैं जीना चाहती हूँ
अपने सत्य के लिए
यदि छीन ली गई है मेरी तथाकथित इज़्ज़त
तो मैं जीना चाहती हूँ
उदाहरण बनना चाहती हूँ
मौन शाप का परिणाम देखना चाहती हूँ
!!!
मेरे आँसू मेरी हार नहीं
मेरी जिजीविषा हैं
क्योंकि हर हिचकी के बाद
एक इंद्रधनुष मेरी वजूद में होता है
...
मैं स्त्री
कृष्ण बनने की कला जानती हूँ
अपने अंदर गणपति का आह्वान करके
अपनी परिक्रमा करती हूँ
मैं स्त्री,
धरती में समाहित अस्तित्व
जिसके बगैर कोई अस्तित्व नहीं
न प्राकृतिक
न सामाजिक
और मेरे आँसू
भागीरथी प्रयास  ... !!!

10 जून, 2016

.....लोग !!!





तमाम उम्र सोचती रही 
कहना है लोगों के बीच अपना सच  ... 
लोग !
लोग !
लोग !
उम्र अब लगभग एक पड़ाव पर है 
और लोग !!! 

लोग नहीं बदले  ... 
मेरी सोच बदल गई -
वे सच जानकर करेंगे क्या !
उन्हें तो सच पहले भी मालूम था 
बस उसे वे मानना नहीं चाहते थे 
गर्म खौलते तेल में पड़ जाए हाथ 
उनकी चाह रही 
जाने क्या संतुष्टि थी !
अब मैं सोचती हूँ 
सच तो जो था 
वो अपनी जगह भयावह था 
लेकिन लोग !!! 
उनसे अधिक नहीं  ... 

03 जून, 2016

शूर्पणखा





शूर्पणखा

रामायण की वह पात्र 
जिसने अपनी मंशा के आगे 
राम लक्ष्मण की विनम्र अस्वीकृति को 
स्वीकार नहीं किया 
और अंततः दंड की वह स्थिति उत्पन की 
जिसने सिद्ध किया 
कि 
अपनी गलतियों पर पर्दा डालकर 
सही" की धज्जियाँ उड़ाई जा सकती हैं !

सीता अपहरण 
जटायु वध 
लंका का सर्वनाश 
सीता की अग्निपरीक्षा 
सीता के चरित्र पर लांछन 
लव कुश का पिताहीन बचपन 
सीता का धरती में समाना  ... 
एक ज़िद का परिणाम रहा। 

युग बदले 
सोच बदली 
परिवर्तित सोच के साथ 
हर पात्र को 
प्रश्नों के मकड़जाल में फंसा दिया सबने 
और अंततः 
... 
शूर्पणखा एक स्त्री थी,
लक्ष्मण को ऐसा नहीं करना चाहिए था 
जैसे स्वर उभरे 
रावण श्रेष्ठ हुआ 
उसके जैसे भाई की माँग हुई 
बीच की सारी कथा का स्वरुप ही बदल गया !

सतयुग हो 
 द्वापर युग हो 
या हो फिर कलयुग 
स्वर अक्सर विपरीत उठते हैं 
प्रमुख सत्य पर चर्चा होती ही नहीं 
न्याय हमेशा शोर बनकर रह जाता है 
और  ... 
एक मंथन में 
सिर्फ अमृत नहीं निकलता 
विष घट भी बाहर आता है 
एक दंश भरे जीव 
जीवन के आगे मृत्यु 
अपना तांडव दिखाती है 
देवता स्तब्ध होते हैं 
मनुष्य की कितनी बिसात !!!

18 मई, 2016

उम्र के केंचुल से बाहर






जब कभी बारिश होती है
जब कभी रुपहले बादल नीचे उतरते हैं 
जब कभी चाँदनी धरती पर उतरती है 
उस उम्रदराज़ औरत के भीतर से 
एक छुईमुई लड़की निकलती है 
हथेलियों में भर लेती हैं बूँदें 
बादलों में छुप जाती है 
चाँदनी को घूँट घूँट पीती है 
मन की ख़ामोशी से परे 
वह बन जाती है शोख हवा  ... 
अल्हड़ सी 
नंगे पैरों खुली सड़क पर छम छम नाचती है 
ज़िन्दगी उसके बालों में 
बूंदों की घुंघरुओं सी खनकती है 
अपनी सफ़ेद लटों को 
चेहरे पर लहराते हुए 
वह खुद में शायर बन जाती है !

कभी सुनना उसके घर की बातें 
शायरी सुनते हुए उसकी माँ कहती है 
- "हाँ तो अभी तुम्हारी उम्र ही क्या हुई!"
बड़े कहते हैं -
"तुम सबसे छोटी हो" 
और वह उम्रदराज़ औरत 
अपने बच्चों की उम्र की हो जाती है 
उसकी थकी आँखों में 
एक नन्हीं सी बच्ची खिलखिलाती है 
और फिर घंटों अपने मन के आँगन में 
वह खेलती है कंचे 
इक्कट दुक्कट 
डेंगापानी
कबड्डी - आइसबाइस 
डाक डाक - किसकी डाक !

उम्रदराज़ सहेलियाँ भी 
उम्र के केंचुल से बाहर निकल आती हैं 
... 
नई, बिल्कुल नई हो जाती हैं 
ज़िन्दगी की तरह 
!!!!!!!!!

02 मई, 2016

कहो कृष्ण !!!




माना कृष्ण 
जो भी होता है वो अच्छे के लिए होता है 
पर जब होता है 
तब तो अच्छा कुछ भी नहीं दिखता 

एक नई स्थिति
नए रूप में 
उबड़खाबड़ ज़मीन पर 
नई हिम्मत से खड़ी होती है 
एक नहीं सौ बार गिरती है 
निःसन्देह,
उदाहरण तो बन जाती है 
पर कृष्ण 
उदाहरण से पूर्व जो वेदना होती है 
बाह्य और आंतरिक 
जो हाहाकार होता है 
वह असहनीय होता है 
... 
तुम ही कहो 
तुम्हारे साथ जो भी हुआ 
उसमें तुम्हारे लिए क्या अच्छा था ? 
गीता सुनाकर भी प्रश्नों के घेरे में हो !!!

यह प्रश्न अनुचित है कृष्ण 
"तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो"
तुम भी समझो 
पूरा गोकुल तुम्हारा था 
कर्तव्य अपनी जगह है 
पर चले जाना हाथ से सबकुछ  ... 
मन को बीमार कर देता है 
भीड़ में अकेला कर देता है !
अकेला होकर आदमी कितनी भी बड़ी बात कह दे 
पर अकेलेपन का दर्द 
उन्हीं बातों को दुहराता है 
जो चला जाता है !!!
ऐसे में 
इस बात की भी कोई ज़रूरत नहीं थी 
कि तुम 
अपने नाम से पहले राधा का नाम दो 
पर इसे देकर तुमने यही विश्वास दिया 
कि तुम राधा के पास हो 
रोने की ज़रूरत नहीं  ... 
फिर भी राधा प्रतीक्षित रोती रही 
तुम राधा को गुनते रहे  ... 
जाने देते इस नाम को 
... 

लाने का उपक्रम तो हम ही होते हैं न कृष्ण 
ऐसा नहीं होता 
तो ऐतिहासिक कहानियाँ नहीं होतीं !
सहकर बढ़ना नियति है 
एक दिन मृत्यु को पाना नियति है 
पर भूल जाना 
मान लेना कि अपना कुछ भी नहीं था 
संभव नहीं है 
जीतेजी जो सबकुछ भूल जाता है 
वह बीमार होता है 
उसे ठीक करने के लिए कई उपाय होते हैं 
... 
नहीं कृष्ण 
जो आज मेरा था 
वह कल किसी और का भी" होगा 
- मान सकती हूँ 
पर वह मेरा नहीं था, यह कैसे मान लूँ ?
क्या तुम देवकी के नहीं थे ?
यशोदा के नहीं थे ?
राधा के नहीं थे ? .... 
यदि यही सत्य है तो लुप्त कर दो कहानियाँ 
क्योंकि,
सारी कहानियाँ भी तो यहीं बनी थीं 
यहीं रह गईं 
फिर कहना-सुनना ही क्या है !
कहो कृष्ण !!!

30 अप्रैल, 2016

निर्बाध,अनवरत ... प्रलाप













वे जो अपने हैं
वे जो अपने नहीं थे
उसके बीच खड़ी मैं
निर्बाध
अनवरत  ... प्रलाप करती हूँ
खुद में सुनती हूँ !
आवाज़ की छोटी छोटी लहरें
स्थिर चेहरा
शनैः शनैः बढ़ता आवेग
अस्थिर मानसिक स्थिति
खोल देती हूँ वो सुकून की खिड़कियाँ
जिन्होंने मुझे जीने की शीतल चाह दी
प्राकृतिक स्थितियों को डावांडोल होने से बचाया
....
सुनामी की स्थिति छंटने लगती है
सत्य सरस्वती की तरह
गंगा-यमुना सी कहानी के मध्य
स्थिर सा प्रवाहित होने लगता है
...
तदनन्तर
सुनने लगती हूँ  अनुत्तरित सवालों के
अडिग,अविचलित जवाब
आंतरिक मुक्ति
और ईश्वर के अधिक साथ होने की स्थिति
मुझे और सशक्त करती है
जो कत्तई निर्विकार नहीं
क्षण क्षण लेती है आकार
ईश्वर की अदृश्य प्रतिमा गढ़ते हुए  ... !

ब्रह्ममुहूर्त में जाग्रत मेरा मैं'
गंगा में गहरी डुबकी लगाता है
मौन लक्ष्य का शंखनाद करता है
प्रत्यक्षतः
मैं अति साधारण
करती हूँ
निर्बाध
अनवरत  ... प्रलाप
गढ़ती हूँ अनुत्तरित सवालों के जवाब
जो गंगा का आह्वान करते हैं
शिवलिंग की स्थापना करते हैं
माँ दुर्गा की भुजायें निर्मित करते हैं
सरस्वती की वीणा को झंकृत करते हैं
विलीन हो जाते हैं ॐ में  ...
वे जो अपने हैं
वे जो अपने नहीं थे
उनके बीच !!!

13 मार्च, 2016

सुनी है ?




सुनी है अपनी पदचाप
जो तुम्हें छूने को
रोक लेने को
पीछे पीछे आती है ?
रख देती है कोई भुला-बिसरा स्पर्श
तुम्हारे कंधों पर
सहला देती है माथे को
और होठ हिल जाते हैं - कौन !
सुनी है कोई खोई हुई पुकार ?
जिसे सुनकर एक चिर परिचित मुस्कान
तुम्हारे चेहरे पर खिल उठती है
सारी थकान भूलकर
यादों का सबसे बड़ा बक्सा
अपनी बातों में खोलकर तुम बैठ जाते हो
धागे कुछ मनुहार के
कुछ रुठने के
कुछ बेबाक हँसी के
कुछ रोने के
कुछ झगड़ने के
बिखेर देते हो अपने इर्द गिर्द
बर्फ के रुपहले फाहों जैसे …
देखा है अचानक कोई अनजाना चेहरा
बरसों से जाना-पहचाना सा
जिसे देखते कोई अपना
बिजली की तरह
तुम्हारी आँखों के आगे कौंध जाता है
आगे बढ़ते क़दमों को रोककर
तुम देखते हो पीछे
और स्वतः बुदबुदाते हो
"थोड़ी देर को लगा कि …"
यह ज़िन्दगी इसी धुरी पर चलती है
कभी तुम चलते हो
कभी हम …

01 मार्च, 2016

जिजीविषा का सिंचन जारी है .......




अपनी उम्र मुझे मालूम है
मालूम है
कि जीवन की संध्या और रात के मध्य कम दूरी है
लेकिन मेरी इच्छा की उम्र आज भी वही है
अर्जुन और कर्ण
सारथि श्री कृष्ण बनने की क्षमता आज भी पूर्ववत है
हनुमान की तरह मैं भी सूरज को एक बार निगलना चाहती हूँ
खाइयों को समंदर की तरह लाँघना चाहती हूँ
माथे पर उभरे स्वेद कणों की
अलग अलग व्याख्या करना चाहती हूँ

आकाश को छू लेने की ख्वाहिश लिए
आज भी मैं शून्य में सीढ़ियाँ लगाती हूँ
नन्हीं चींटी का मनोबल लेकर
एक बार नहीं सौ बार सीढ़ियाँ चढ़ी हूँ
गिरने पर आँख भरी तो है
पर सर पर कोई हाथ रख दे
इस चाह से उबरी मैं
गिरकर उठना सीख गई हूँ  ... !

शून्य अपना
सीढ़ियाँ अपनी
चाह अपनी
कई बार आसमान ही नीचे छलांग लगा लेता है
सूरज मेरी हथेलियों में दुबककर
थोड़ा शीतल हो जाता है !
सच है
दर्द और ख्वाहिश सिर्फ धरती की नहीं
आकाश की भी होती है
मिलने का प्रयोजन दोनों ही
किसी न किसी माध्यम से करते हैं
...
मैं कभी धरती से गुफ्तगू करती हूँ
कभी आसमान को सीने से लगा लेती हूँ
किसी तार्किक प्रश्न से कोई फायदा नहीं
उन्हें भी समझाती हूँ।
व्यक्ति कभी कोई उत्तर नहीं देता
समय देता है
कभी आस्तिक होकर
कभी नास्तिक होकर
...
मुझे सारे उत्तर समय असमय मिले
माध्यम कभी अहिंसक मनोवृति रही
कभी हिंसक
अति निकृष्ट काया भी दाँत पीसते
भयानक रस निचोड़ते
दर्दनाक अट्टहासों के मध्य
गूढ़ रहस्य का पता दे गई
वाद्य यंत्रों के मधुर तानों के साथ
किसी ने रास्तों को बंद कर दिया
श्वेत बालों ने
चेहरे पर उग आई पगडंडियों ने
पटाक्षेप का इशारा किया
लेकिन,
मेरी चाह है बहुत कुछ बनने की
जिनी, अलादीन,सिंड्रेला,लालपरी
...
बुद्ध,यशोधरा
अर्जुन,कर्ण
एकलव्य  ... और सारथि कृष्ण
कुछ अद्भुत
कुछ रहस्यात्मक करने की चाह
मेरे सम्पूर्ण शरीर में टहनियों की तरह फैली है
अबूझ भावनाओं के फल-फूलों से लदी हुई ये टहनियाँ
संजीवनी हैं - मेरे लिए भी
और देखे-अनदेखे चेहरों के लिए भी

जिजीविषा का सिंचन जारी है   .......... 

सबके सब डरे हुए हैं आगत से

हम बच्चों को सिखा रहे उच्च स्तरीय रहन सहन हर बात की सुविधा दे रहे उसके साथ मत खेलो ये मत खेलो ये खेलो कोई गाली दे तो गाली दो मार...