30 जून, 2008

रिश्ते......


मैं सोचा करती थी,
रिश्ते साथ चलते हैं!
रास्ते एक होते हैं!
हार नहीं मिलती!पर.....
वक्त ने बताया,
वक्त का एक खेल हैं- ये रिश्ते!
बस एक puzzle है...
और उसके लिए पास में होता है-
sand टाइमर!
गर जोड़ लिया तुमने रंगों का ताना-बाना,
तो ठीक-
नहीं तो अनसुलझे प्रश्न रह जाते हैं-
सारे रंग बेरंग हो जाते हैं,
अब जाना-
ये रिश्ते हमें बहुत रुलाते हैं!

28 जून, 2008

पैगाम ......



विश्वास की ज़मीन

रंगोली से सजी है,

विजय ध्वज लहराता सूरज

आँगन उतरा है,

पक्षियों के खोए कलरव

वाद्य-यंत्रों से गूंज उठे हैं,

आंखों से खुशियों की बरसात हुई है,

ह्रदय आशीर्वचनों से मुखर हुआ है,

संगम के तीरे आज मेला लगा है.......

मेरे सपने साकार हुए,

मेरे अपने निहाल हुए,

मेरी जिंदगी में खुशियों के फूल खिले हैं,

मेघराज की गर्जना नगाडों - सी हुई है,

बूंदें नई जिंदगी के पैगाम लायी है...........

23 जून, 2008

हकीकत की बुनियाद!




रात रोज़ आती है


कभी हल्के,


कभी गहरे,


कभी तूफ़ान-सी!


सपने भी तैरते हैं बंद आंखों में-


कभी मीठे, कभी नमकीन, कभी बेबस-से!


पर सपने जैसे भी हों,


मुझे अच्छे लगते हैं


मैं उनकी बारीकियों पर गौर करती हूँ-


हर सपने का एक अर्थ होता है,


मैं उन्हें याद रखती हूँ........


तो जब तक जिंदा हूँ,


रात है, नींद है, सपने हैं.........


यानि हकीकत की बुनियाद है!

20 जून, 2008

मृत्यु से पहले....


कैसे कोई झूठ बोलता है?
झूठ के धरातल पर,
ईश्वर के आगे सर झुकाता है!
क्या ईश्वर की शक्ति का डर नही?
या ईश्वर का भी सम्मान नही?
क्या कान पकड़ लेने से,
भगवान् हिंसक लोगों की हिंसा को
नज़रंदाज़ कर देते हैं?
................
पैसे की जीत कभी नहीं होती,
हो ही नहीं सकती.......
पैसे तो गली-गली बरसते हैं,
सुकून तो अमृत बूंद की तरह,
शरद पूर्णिमा को ही टपकता है.........
मैंने उसे ही इकठ्ठा किया है,
आश्चर्य!
उसने पैसे की आड़ में मेरा सुकून लेना चाहा है....
मेरे विचारों से कोई मुझे अलग कर दे,
ये मुमकिन नहीं!
विश्वास ने ही अब तक मुझे चलाया है,
वरना पैसों की कमी न थी.....
खुद्दारी का सुकून ले,
मैंने लक्ष्य पूरा किया ,
फेंके पैसों से मैंने अपने 'स्व' को
नहीं गंवाया-
तुम लाख सर पटक लो,
ईश्वर माफ़ नहीं करेगा,
मृत्यु से पहले एक-एक हिसाब करेगा............

17 जून, 2008

दो सच...


(1) शब्दों का मर्म
शब्दों का मर्म जो समझते हैं,
वे मर्महीन कैसे हो सकते?
रिश्तों से टूटकर शब्दों के साथ जीना आसान नहीं होता,
इसे समझना आम लोगों के बस में नहीं होता......
एहसास तो सारी रात जागते हैं,
नींद से कोसों दूर आँखें

जागती आँखों के मर्म से अनभिज्ञ नहीं रहतीं.........
अनछुए एहसासों से अलग नहीं रहती।

(2) जिंदगी एक खुशनुमा पल................
जिंदगी एक खुशनुमा पल है,
निर्भर है तुम पर-इस पल को कैसे संवारते हो!
न वक़्त ठहरता है,
न लोग..........
पर गर तुमने वक़्त की नाजुकता को जान लिया,
तो ज़िन्दगी मेहमान बन जाती है,
मेहमानावाजी भी तुम पर-
चाहो तो कांटे बिखेर दो,
या रास्तों को फूलों से सजा दो,
जो भी करना है,जल्दी करो,
कभी भी हाथ आया वक़्त नाउम्मीदी मे ढल सकता है,
उसे गंवाकर किस्मत को जिम्मेदार न कहना.............

16 जून, 2008

नई रचना........


सारथी आज भी श्रीकृष्ण रहे,
पर महाभारत के दिग्गज यहाँ नहीं थे-
थी एक पत्थर हो गई माँ और उसके मकसद,
विरोध में संस्कारहीन घेरे थे...........
कृष्ण ने गीता का ही सार दिया,
और दुर्गा का रूप दिया,
भीष्म पितामह कोई नहीं था,
ना गुरु द्रोणाचार्य थे कहीं.........
दुर्योधन की सेना थी,
धृतराष्ट्र सेना नायक ,
और साथ मे दुःशासन !
एक नहीं , दो नहीं ,पूरे २४ साल,
चिर-हरण हुआ मान का,
पर श्रीकृष्ण ने साथ न छोड़ा..........
जब-जब दुनिया रही इस मद में ,कि-
पत्थर माँ हार गई , -
तब - तब ईश्वर का घात हुआ ,
और माँ को कोई जीत मिली....
अब जाकर है ख़त्म हुआ,
२४ वर्षों का महाभारत ,
और माँ ने है ख़ुद लिखा,
अपने जीवन का रामायण...........

07 जून, 2008

चमका सितारा...........

आज ऋतुराज बसंत मेरे आँगन उतरा है,
जेठ की दोपहरी सौंधी खुशबू से भर गई है...
मेघों का समूह सावन का संदेश ले आया है,
ख्वाबों की धरती पर हकीकत की जड़ें मजबूत हुई हैं॥
टप-टप गिरती बूँदें
सारी फिजाओं में मचल रही हैं।
यह अजूबा मेरी ज़िंदगी का है
मेरा चाँद आकाश के चाँद को छू रहा है,
मन्दिर में शंखनाद है,
देवता स्वयं आशिर्वचनो का जाप कर रहे हैं,
हाँ आज काँधे पर सितारा चमका है............

चलो बच्चे बन जाओ

हर बार कहा कहते आये हैं - बड़े हो जाओ तुम बड़े हो गए तुम बड़ी हो गई तुम भी बड़ी हो गई लेकिन मैं ! जब कहीं से हारी थकी अपने स्वप्निल...