18 नवंबर, 2017

सबके सब डरे हुए हैं आगत से




हम बच्चों को सिखा रहे उच्च स्तरीय रहन सहन
हर बात की सुविधा दे रहे
उसके साथ मत खेलो
ये मत खेलो
ये खेलो
कोई गाली दे तो गाली दो
मारे तो मारके आओ ...
हर विषय को खुलेआम रख दिया है
फिर ?!
कौन सी संवेदना
उनके भीतर पनपेगी !
एक कोमल लता को
डोरी से बाँधकर
हम जिस दिशा में करेंगे
वह उसी तरफ जाएगी
जन्मगत संस्कार
काफ़ी उधेड़बुन से गुजरते
और पनपते हैं !
बच्चे - बच्चे कम,
सर से पाँव तक शो पीस लगते हैं
हम कितने माहिर अभिभावक हैं
इसकी होड़ में
वे रोबोट लगते हैं !
समझ में नहीं आता
दया किस पर दिखाई जाए
हमने परिवार,
समाज,
मीडिया,
सबकुछ मटियामेट कर दिया
स्वाभाविक बचपना
नाममात्र रह गया है
वो भी कहीं कहीं
सबके सब डरे हुए हैं आगत से
लेकिन आधुनिक रेस में शामिल हैं

15 नवंबर, 2017

मैं तुमसे कभी नहीं मिलना चाहूँगी




मैं तुमसे कभी नहीं मिलना चाहूँगी
फिर भी,
गर मिल गए
तो मेरी खामोश नफरत को कुरेदना मत
क्योंकि उससे जो आग धधकती है
उस चिता में
तुम्हारे संग
 कुछ आत्मीय चेहरे भी
झुलसने लगते हैं
उन चेहरों को निकालते हुए
मेरा हृदय छालों से भर जाता है
फिर ...

जिस किसी ने भी
यूँ ही सही
तुम्हारा हाल पूछा है
जवाब देते हुए मैंने
एकलव्य की तरह बाण चलाये हैं
द्रोणाचार्य को बेबसी से देखा है
उस क्षण भूल गई हूँ
एक शिष्य का कर्तव्य !
बात दक्षिणा की नहीं
श्रद्धा, सम्मान की है
जब जब तुम्हारा ज़िक्र हुआ है
मेरे संतुलित संस्कार नष्ट हो गए हैं !!!

मेरी सहजता ने सच कहा सबसे
बताया मेरी नफरत का अर्थ विस्तार से
लेकिन
आह! करके
वे तथाकथित अपने
निर्विकार होकर तुम्हारी बातें करने लगे
बात बुरा लगने की नहीं थी
बात थी मेरी उन हत्याओं की
जो कई स्थलों पर
कई बार हुई ...
बिल्कुल जलियाँवाला बाग़ की तरह !

यद्यपि
ये सारे निर्विकार अबोध
अपनी छोटी सी बात पर
दुःशासन बन जाते हैं
कहीं भी
कभी भी
अपमानित करने से नहीं चुकते
पर,
जहाँ मौन रहना चाहिए
या एक सत्य की रक्षा में
झूठ बोलना चाहिए
वहाँ सूक्तियाँ बोलते हैं !

यदि ऐसा करना
इनका इठलाना है
तो ज़रूरी है ये जानना
इठलाते हुए
अनाप शनाप बोलते हुए
ये खुद को हास्यास्पद बनाते हैं
अपने इर्द गिर्द नकारात्मकता फैलाते हैं  ...

खैर,
मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ
कि
मैं तुमसे कभी नहीं मिलना चाहूँगी
फिर भी,
गर मिल गए
तो मेरी खामोश नफरत को कुरेदना मत !!!

11 नवंबर, 2017

ज़िन्दगी की सम्पूर्णता बेतरतीब ही होती है




 जीवन के अब तक के सफर में
कई ऐसे घर मिले
जहाँ सबकुछ
एक सुनिश्चित जगह पे था
व्यवहार में शालीनता
मृदुता थी
लेकिन एक कमरा
 सिसकियों से भरा था
जहाँ थे कुछ कागज़ के टुकड़े
उनमें खींची हुई रेखाएँ
जो मासूम सपनों का आभास देती थीं !
एक संदूक
चिट्ठियों 
और पुराने कपड़ों से भरा
....
जिस दिन वह कमरा खुलता
चिट्ठियों को उलटपुलट
नए सिरे से पढ़ा जाता
कपड़ों की चरमराती तहे खुलतीं
तो .... सपने ही सपने फैल जाते थे आंखों में
उस दिन,
सुनिश्चित जगह वाला घर
और उसे मृदु रखनेवाला
तरतीब से होकर भी
मुझे ... बेतरतीब दिखाई देता
.....!
कितनी बार चाहा
कुछ ऐसा कर दूं
कि सिसकियाँ बन्द हो जाएं
वजहें प्रवाहित हो जाएं
पर धीरे धीरे जाना
ज़िन्दगी की सम्पूर्णता बेतरतीब ही होती है

09 नवंबर, 2017

सुबह .... हमेशा एक सी नहीं होती




सुबह .... हमेशा एक सी नहीं होती
नहीं होता कहीं एक सा घर
घर के कोने बदल जाते हैं
बदल जाती हैं खिड़कियाँ
पेड़ों के झुरमुट
फूलों की खुशबू
फेरीवाले की पुकार
.....
एक सुबह हुआ करती थी
हम भाई बहनों की
अम्मा पापा के साथ
जिसमें जलेबी की मिठास थी
प्रभात फेरी का नशा था
जूते को चमकाते हुए
पॉलिश क्या
जीभ छूकर जूते को गीला कर लेते थे
या अपने ही कपड़े के कोने से
आँख बचाकर जूते को पोछ लेते थे !
मीठी हवा , भीनी धूप, झीनी चाँदनी
और वो गोलम्बर
.... मन्दिर की घण्टियाँ भी बजती थीं
अजान के स्वर भी झंकृत थे
सर्व धर्म एक सा सूर्योदय
चेहरे को छू जाता था ....
घर वही था कुछ वर्षों तक
पर सुबह में वह बात नहीं रही
बिना उदासी का अर्थ जाने
आंखें उदास रहने लगीं !!!
वह सुबह फिर कभी आई ही नहीं ....

बरसों बाद एक आज़ाद सूरज
खिड़की से ,
बालकनी के दरवाजे से छनकर आया
गौरैया चहकी
घर के कोने बदल गए थे
पेड़ों का झुरमुट नहीं था
लेकिन कमाल का बना वह छोटा सा घर
!!!
सुबह नन्हें पैरों को गुदगुदाती
माँ की पुकार
चूल्हें से उठती सोंधी खुशबू लगती !
गाहे बगाहे
अंग्रेजों के बूट बजते थे
मचलते पैर कई बार स्थिर हो जाते थे
लेकिन सरफरोशी की तमन्ना ने
हमारी सुबह को मरने नहीं दिया
समय की सीख कहें
या खुद का हौसला
हम अपने भींचे जबड़ों की मुस्कान में
सुबह का स्वागत करने लगे
और सुबह
एक मीठी गुनगुनाती हवा के संग
हम सबके सपनों में हम होंगे कामयाब की
धुन बन गया ....
सपने हकीकत हुए
समय की माँग पर
फिर घर बदले
बदल गई खिड़कियाँ
....
अब यादों की सुबह होती है
इस विश्वास के साथ
फिर गुदगुदाएगा सूरज
और दो बाँसुरी बोलेगी
माँ ...पापा ...
तवे पर सोंधी सोंधी रोटियाँ पकेंगी
दो दो सबके नाम से  ...

26 अक्तूबर, 2017

यदि तुम चाहो !!!




बैठो
कुछ खामोशियाँ मैं तुम्हें देना चाहती हूँ
वो खामोशियाँ
जो मेरे भीतर के शोर में
जीवन का आह्वान करती रहीं
ताकि
तुम मेरे शोर को पहचान सको
अपने भीतर के शोर को
अनसुना कर सको !

जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा
कभी बेहद लम्बी होती है
कभी बहुत छोटी
कभी  ...
न जीवन मिलता है
न मृत्यु !!

जन्म ख़ामोश भय के आगे
नृत्यरत शोर है
मृत्यु
विलाप के शोर में
एक खामोश यात्रा  ...
शोर ने मुझे बहुत नचाया
ख़ामोशी ने मेरे पैरों में पड़े छालों का
गूढ़ अर्थ बताया  ...

बैठो,
कुछ अर्थ मैं तुम्हें सौंपना चाहती हूँ
यदि  ...
यदि तुम चाहो !!!

18 अक्तूबर, 2017

मृत्यु को जीने का प्रयास




मौत से जूझकर
जो बच गया ...
उसके खौफ,
इत्मीनान,
फिर खौफ को
मैं महसूस करती हूँ !
कह सकती हूँ
कि यह एहसास मैंने भोगा है
एक हद तक
इसकी शाब्दिक व्याख्या हो सकती है .....

पर वह
 ... जो मृत्यु से जूझता रहा
दम घुटने
साँस ले पाने की जद्दोजहद से गुजरता रहा
फिर !!!
वह नहीं रहा !
उसके जीवन मृत्यु संघर्ष के मध्य
क्या चलता रहा
चला
या नहीं चला !
सितार के कसे तार के
 टूट जाने की स्थिति सी
होती है अपनी मनःस्थिति
....
मृत्यु को जीने का प्रयास
अजीब सी बात है
पर
...!
ढूँढती रहती हूँ वह एहसास
वह शब्द
और ....
जाने कितनी बार उजबुजाते हुए मरती हूँ
....
!!!!

13 अक्तूबर, 2017

शाश्वत कटु सत्य ... !!!




जब कहीं कोई हादसा होता है
किसी को कोई दुख होता है
परिचित
अपरिचित
कोई भी हो
जब मेरे मुँह से ओह निकलता है
या रह जाती है कोई स्तब्ध
निःशब्द आकुलहट
उसी क्षण मैं मन की कन्दराओं में
दौड़ने लगती हूँ
कहाँ कहाँ कौन सी नस
दुख से अवरुद्ध हो गई"
कहाँ मौन सिसकियाँ अटक गई
संवेदनाओं के समंदर में
अथक तैरती जाती हूँ
दिन,महीने,वर्षों के महीन धागे पर
चलती जाती हूँ निरंतर
रिसते खून का मलाल नहीं होता
.... !!!

लेकिन,
कई बार
कितनों के दुखद समाचार
मुझे उद्वेलित नहीं करते
मन के कसे तार
टूटते नहीं
किंकर्तव्यविमूढ़ मैं
मन के इस रेगिस्तान के
तपते अर्थ ढूँढती हूँ
जिसके आगे
तमाम नदियाँ शुष्क हो जाती हैं
खुद को झकझोर कर
खुद ही पूछती हूँ
क्या मैं इतनी हृदयहीन हूँ ?
हो सकती हूँ ?
चिंतन का महाप्रलय अट्टाहास करता है
....
नज़रें घुमाओ
देखो
जानो
समझो
कि हर संवेदना
कहीं न कहीं हृदयहीन होती है
अब इसे वक़्त की माँग मान लो
या ईश्वरीय प्रयोजन
पर है यह शाश्वत कटु सत्य  ... !!!


11 अक्तूबर, 2017

कागज़ की नाव




ये इत्ता बड़ा कागज़
कित्ती बड़ी नाव बनेगी न
पापा, अम्मा, भईया, दीदी
पूरा का पूरा कुनबा बैठ जाएगा
फिर हम सात समंदर पार चलेंगे
... रहने नहीं रे बाबा
घूमने चलेंगे।

चलो इस कागज़ को रंग देते हैं
बनाते हैं कुछ सितारे
सात रंगों से भरी नाव
कित्ती शानदार लगेगी
...
फिर हम सात समंदर पार चलेंगे
... रहने नहीं रे बाबा
घूमने चलेंगे।

अर्रे
इस कागज़ को बीचोबीच
किसने फाड़ दिया
रंग भी इधर से उधर हो गए
अब सात समंदर पार कैसे जाएँगे ?
घूमना ही था न
रहने की बात तो कही ही नहीं थी !

खैर,
चलो न
दो छोटी छोटी नाव ही बना लें
कौन किसमें बैठेगा
बाद में सोचेंगे
फिर कागज़ फटे
उससे पहले
हम सपनों को पूरा कर लें
सात समंदर पार चलें
... रहने नहीं रे बाबा
घूमने चलेंगे।

08 अक्तूबर, 2017

इस मार्ग की सभी लाइनें अवरुद्ध हैं !




पहली बार
कर लो दुनिया मुट्ठी के साथ
जब एक मोबाइल हाथ में आया
तो ... कोई जल गया
और किसी ने कनखिया के देखा
कुछ दिन तक
 सबकुछ
जादू जादू जैसा रहा ...

जिस जिसने कहा
कि भाई तौबा
यह बड़ी बेकार की चीज है
वे सब हसरत से मोबाइल को देखते
बहुत वक़्त नहीं लगा
धीरे धीरे यह नन्हा बातूनी
सबके हाथ में
अलग अलग अंदाज में बजने लगा
...
कॉलर ट्यून,रिंग टोन
पूरी दुनिया
सच्ची
मुट्ठी में आ गई .
किसी से
एक कॉल कर लेने की इजाज़त की गुलामी से
सबके सब मुक्त हो गए !

फिर मोबाइल की चोरी होने लगी
संभाल कर रखने के लिए
ऐड और बैग का
नई नई तकनीकों का इजाफा हुआ ...

 नई उम्र कहीं भी गुफ़्तगू करती दिखाई देने लगी
पेड़ के नीचे
बालकनी में
टहलते हुए
....
ऐसे में ही एक दिन
 देखा था गाड़ी के अंदर
एक लड़के को
वह कभी ठहाके लगाता
कभी बाँये दाँये देखता
सर हिलाता
कुछ बोलता
फिर हँसता .... मुझे पक्का विश्वास हो गया
कोई पागल है !
बच्चों से कहा
तो वे किसी बुद्धिजीवी की तरह बोले
... क्या माँ !
अरे वह इयरफोन लगाए हुए है
वो देखो कान में .....
मैंने कहा,
हाँ हाँ चलो ठीक है
लेकिन इस तरह अकेले गाड़ी में
पागल ही लग रहा है !

फिर यह इयरफोन
सबके कान के स्विच बोर्ड में लगा हुआ
घूमने लगा
अकेले बोलते हुए
सब आसपास से दूर हो गए
किसी को किसी की ज़रूरत नहीं रही
दूर के ढोल सुहाने लगते हैं
हर पल चरितार्थ होने लगा !

लोकल बातचीत
इंटरनेशनल बातचीत
वाट्सएप्प
वीडियो कॉल
सबकुछ इतना आसान
इतना आसान हो गया
कि शिकायतें बढ़ गईं
मिलने की उत्सुकता मिट गई
राजनीति
हत्या
शेरो शायरी
सबकुछ वायरल हो गया ....!

वाट्सएप्प के चमत्कारिक गोलम्बर पर
सब एकसाथ खड़े हो गए
नानी फैमिली
दादी फॅमिली
फैमिली ही फैमिली
ग्रुप ही ग्रुप
जहाँ
लेफ्ट हुए
इन हुए
लूडो फाड़ने सा खेल हो गया !

दुनिया ऐसी मुट्ठी में आई
कि मार्ग की सभी लाइनें अवरुद्ध हो गईं
.....!!!

19 सितंबर, 2017

चलो बच्चे बन जाओ




हर बार कहा
कहते आये हैं - बड़े हो जाओ
तुम बड़े हो गए
तुम बड़ी हो गई
तुम भी बड़ी हो गई
लेकिन मैं !
जब कहीं से हारी थकी
अपने स्वप्निल पंखों में छुपकर बैठती हूँ
तब सोचती हूँ
क्या सच में इस मायावी
दुनियादारी से भरी दुनिया में
तुम बड़े हो सके हो ?

वो जो बड़ा होना कहते हैं न
वो तुमलोग क्या
मैं ही नहीं हो पाई हूँ !
दुनिया प्रतिपल भाग रही
और हम
भागते हुए
एक दूसरे का हाथ पकड़ लेते हैं
फिर भी हमारी वह रफ़्तार नहीं होती
भागने का अर्थ है
सिर्फ अपने तक सिमटना
जो हम नहीं कर पाते
और हाथ छूटते ही
.... हम निष्प्राण हो जाते हैं !
........ ........ ........
बेहतर है
चलो बच्चे बन जाओ
मैं भी छोटी सी माँ बन जाती हूँ
कुछ शीशे छनाक से गिरें
कुछ शोर हो यूँ
किसने तोड़ा
हँसते हँसते कहीं छुप जाएँ
तुमलोगों के कुछ मन रह गए थे
चलो उनको पूरा करती हूँ

15 सितंबर, 2017

एक प्रतिमा मैंने भी गढ़ना शुरू किया है !



स्तब्ध हूँ
या .... विमुख हूँ
कि क्या हो रहा है !
या यह तो होना ही था !
वे तमाम लोग
जिनकी अपनी शाख थी
भूल गए हैं दिनकर की पंक्तियाँ
क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो ....
....
वे भूल गए हैं उस हुंकार को
जो भरी सभा को हतप्रभ कर दे
... कोई नहीं कहता
शर चाप शरासन साध मुझे
हाँ हाँ दुर्योधन बांध मुझे ...
बस 5 ग्राम की माँग करते हैं
और नहीं मिलने पर
मित्रता विनम्रता त्याग का उदाहरण देते हुए
आगे बढ़ जाते हैं !
कृष्ण की छोड़ो
अर्जुन या कर्ण बनने की भी
कोई गुंजाइश नहीं !!
पूरी सभा की आलोचना करते हुए
सब के सब पलायन करते हैं
....
नहीं नहीं इनमें कोई धृतराष्ट्र नहीं
ना ही गांधारी है कोई
सब खुद को संजय मानते हुए
जाने कौन सी कथा दुहरा रहे हैं
!!!
एक वक्त था
जब किसी में मैंने
व्याघ्र सी छवि देखी थी
उसे अब नकली व्याघ्र की पीड़ा में पाकर
मैं खुद से शर्मिंदा हूँ !

किसका डर ?
क्या खोने का डर ?
कौन सा सम्मानित सिंहासन है कहीं
जिसके भ्रम में
ये सब अपमान की अग्नि में झुलस रहे
और खुद को प्रहलाद मान रहे !

होलिका जलेगी ?
सत्य की जीत होगी ?
या एक ही शरीर मे
होलिका,शूर्पनखा,पूतना,ताड़का होगी ?
प्रश्न गंभीर है
परिणाम तो गम्भीर हो ही रहे हैं
आह्वान यदि गंगा का है
तो एक नदी
निर्बाध
खुद में प्रवाहित करनी होगी
जिस दिखावे के धर्म का विसर्जन हो रहा
उस विराट प्रतीकात्मक ईश्वर को
अपने भीतर आत्मसात करना होगा
...
 मानना होगा कि जिस शक्ति से
हम भाग चुके हैं
उसे हथियार बनाना है !
यह गलत
वह गलत
पूरी सरकार गलत कहने की जगह
हिसाबों का ब्यौरा देने की बजाय
खुद को खड़ा करना होगा
करोड़ों की मालकियत से उतरकर
 ज़मीन को प्रणाम करना होगा
ऊँची ऊँची अट्टालिकाओं से नीचे आकर
ईमान की मिट्टी को छूकर
शपथ उठाना होगा
राम का गुणगान करने के बदले
दशहरा में रावण को जलाने से पूर्व
खुद में राम को प्रतिष्ठित करना होगा
रामराज्य लाना होगा
वरना तो सारे मुखौटे एक से हैं
कोई सीता को सरेआम घसीट रहा
कोई अपनी पत्नी को स्वयम ही
रावण के पास भेज रहा
और जो गिनेचुने अदृश्य चेहरे हैं
उनके लापता होने की खबर से
वे खुद भी अनजान हैं
और मैं
खुद की स्तब्धता
खुद की विमुखता से
शर्मिंदा हूँ
.....
अब इस प्रलाप के बाद
तुम इसे पलायन समझो
या महाभिनिष्क्रमण
वह तुम्हारी बौद्धिक स्थिति होगी
जिसे तुम गढ़ रहे होगे
....
एक प्रतिमा मैंने भी गढ़ना शुरू किया है ......... !!!


सबके सब डरे हुए हैं आगत से

हम बच्चों को सिखा रहे उच्च स्तरीय रहन सहन हर बात की सुविधा दे रहे उसके साथ मत खेलो ये मत खेलो ये खेलो कोई गाली दे तो गाली दो मार...